ठाकरे बंधुओं की नजदीकी से बदलेगा महाराष्ट्र का सियासी गणित? महायुति ने बताया इसे ‘फायदे का सौदा’
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। एक वक्त पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहने वाले ठाकरे बंधु—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—अब स्थानीय निकाय चुनावों में साथ आने की संभावनाएं जता रहे हैं। 20 साल बाद दोनों नेताओं की संभावित साझेदारी की खबर ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे को लेकर चर्चाएं हैं कि दोनों आगामी निकाय चुनाव एकसाथ लड़ सकते हैं। इस गठबंधन की संभावना पर शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने भी बयान दिया है, जिससे राजनीतिक पारे में और इज़ाफा हो गया है।
संजय राउत के बयान से चर्चाओं को मिली हवा
शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र के लोगों का मानना है कि राज्य के विकास और मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए दोनों ठाकरे भाइयों को साथ आना चाहिए। उन्होंने इशारा किया कि अगर उद्धव और राज ठाकरे एक मंच पर आते हैं, तो यह न केवल मराठी मतदाताओं को जोड़ने का प्रयास होगा, बल्कि राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं।
संजय राउत ने यह भी स्पष्ट किया कि इंडिया गठबंधन मुख्य रूप से लोकसभा चुनाव के लिए गठित हुआ था, जबकि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए महाविकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन है। उनके मुताबिक, स्थानीय निकाय चुनावों में अलग रणनीति अपनाई जा सकती है।
रामदास अठावले का पलटवार: “महायुति को मिलेगा फायदा”
राउत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के प्रमुख रामदास अठावले ने कहा कि अगर राज और उद्धव ठाकरे मिलकर चुनाव लड़ते हैं, तो इसका नुकसान इंडिया गठबंधन को होगा और सत्ताधारी महायुति को फायदा मिलेगा।
अठावले ने कहा, “जब लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन एकजुट होकर चुनाव लड़ा तब भी महायुति जीती। अब अगर ठाकरे बंधु साथ आते हैं, तो मराठी मतों में बिखराव होगा और उसका सीधा लाभ बीजेपी, एकनाथ शिंदे और अजित पवार के नेतृत्व वाली महायुति को मिलेगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई में करीब 40% मराठी और 60% गैर-मराठी मतदाता हैं। ऐसे में ठाकरे बंधुओं का एकजुट होना मराठी वोटों को बांट सकता है, जिससे महायुति के लिए जीत आसान हो सकती है।
कांग्रेस और एनसीपी की रणनीति पर उठे सवाल
संजय राउत के बयान के बाद महाविकास अघाड़ी में शामिल दल—कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट)—की रणनीति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। कांग्रेस पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह निकाय चुनावों में अकेले उतरने पर विचार कर रही है।
इससे यह अंदेशा जताया जा रहा है कि महाविकास अघाड़ी के घटक दलों के बीच निकाय चुनावों को लेकर समन्वय की कमी हो सकती है। यदि शिवसेना (यूबीटी) और मनसे मिलकर चुनाव लड़ते हैं और कांग्रेस एवं एनसीपी अलग रास्ता अपनाते हैं, तो विपक्ष की एकजुटता पर असर पड़ सकता है।
क्या मराठी अस्मिता की राजनीति फिर होगी केंद्र में?
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, दोनों ही मराठी अस्मिता और मुंबई की सांस्कृतिक पहचान को लेकर मुखर रहे हैं। अगर दोनों एक साथ आते हैं, तो यह गठबंधन मराठी मतदाताओं में एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा कर सकता है। हालांकि इसके लिए यह जरूरी होगा कि दोनों पार्टियां सीटों के बंटवारे और चुनावी एजेंडे पर आपसी सहमति बना सकें।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इस गठबंधन से मराठी वोट बैंक में असर पड़े, लेकिन मुंबई और महाराष्ट्र जैसे विविध सामाजिक ढांचे वाले राज्य में केवल मराठी मुद्दे पर चुनाव जीतना आसान नहीं होगा।
सियासी हलचल का असर क्या होगा?
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की संभावित नजदीकी ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह गठबंधन हकीकत में बदलता है या केवल एक राजनीतिक संकेत बनकर रह जाता है।
वहीं महायुति के नेताओं का यह दावा कि इस एकजुटता से विपक्ष कमजोर होगा, भी रणनीतिक रूप से मजबूत नजर आता है।
आगामी निकाय चुनावों के साथ-साथ विधानसभा चुनावों में भी यह समीकरण बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं। लेकिन इन सबके बीच यह तय है कि ठाकरे बनाम ठाकरे की लड़ाई अब शायद “ठाकरे संग ठाकरे” में बदलने वाली है – और यही बदलाव महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू कर सकता है।
