नीतीश सरकार पर बढ़ता असंतोष: बिहार में एंटी इनकंबेंसी फैक्टर प्रभावी
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच जातीय समीकरणों की चर्चा तो है ही, लेकिन इसके साथ-साथ इस बार एंटी इनकंबेंसी भी एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरता दिख रहा है। जातिगत वोट बैंक पर आधारित समीकरण जहां सत्ता की चाबी माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर लंबे समय से शासन कर रही सरकारों को जन असंतोष का सामना भी करना पड़ता है। बिहार में करीब दो दशकों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज नीतीश कुमार इस बार उसी असंतोष की लहर में फंसते दिखाई दे रहे हैं।
सर्वे में खुलासा: नीतीश सरकार के खिलाफ नाराज़गी
‘आईओएन भारत’ नामक संस्थान ने एक सर्वे कराया है, जिसमें एंटी इनकंबेंसी फैक्टर को समझने की कोशिश की गई। इस सर्वे का नेतृत्व सेफोलॉजिस्ट रामबन्धु वत्स ने किया। सर्वे के लिए 5340 अतिपिछड़ी जातियों के वार्ड पार्षदों से सवाल पूछे गए। उनके जवाबों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि नीतीश सरकार के खिलाफ लोगों में गहरा असंतोष है।
नीतीश कुमार की लोकप्रियता में गिरावट
सर्वे का सबसे अहम पहलू यह है कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता में गिरावट देखी गई है। सर्वे के मुताबिक 63% लोगों ने साफ तौर पर कहा कि वे सरकार के कामकाज से असंतुष्ट हैं। वहीं केवल 16% लोग ऐसे हैं जो सरकार से संतुष्ट नजर आए। शेष 21% लोग इस पर कोई स्पष्ट राय नहीं दे सके।
सरकार के खिलाफ नाराजगी के मुख्य कारण
सर्वे में एंटी इनकंबेंसी के जिन कारणों को प्रमुख बताया गया, उनमें बेरोजगारी, नौकरशाही की मनमानी, विकास कार्यों में ढिलाई, रिश्वतखोरी, खराब कानून-व्यवस्था, शराबबंदी की विफलता, बालू खनन में अनियमितता, टेंडर प्रणाली में पक्षपात और भूमि विवाद शामिल हैं। खास तौर पर जमीन से जुड़े भ्रष्टाचार और नकली कागजातों के चलते हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी ने लोगों को सरकार से दूर कर दिया है।
नीतीश की खराब सेहत और राजनीतिक पकड़ पर सवाल
सेफोलॉजिस्ट वत्स का कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गिरती सेहत को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है। इसी कारण सरकार की सक्रियता पर सवाल उठ रहे हैं। जेडीयू जैसे दल में अब फैसले नीतीश कुमार की बजाय अन्य नेता ले रहे हैं, जिससे उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई है।
सीएम चेहरा अभी भी प्रभावशाली?
हालांकि, सर्वे में यह भी सामने आया कि अभी भी 34% लोग ऐसे हैं जो विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के चेहरे को देखकर वोट डाल सकते हैं। वहीं 19% लोग ऐसे हैं जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे उन्हें वोट नहीं देंगे। लगभग 47% लोगों ने ‘पता नहीं’ वाला विकल्प चुना, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक बड़ा तबका अभी भी असमंजस में है।
पहले भी सटीक रहे हैं रामबन्धु वत्स के सर्वे
इससे पहले भी रामबन्धु वत्स के सर्वे छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में सटीक साबित हुए थे। वर्ष 2018 में उनके सर्वे ने वहां की भाजपा सरकार की हार का संकेत दिया था और वर्ष 2023 में आदिवासी और सतनामी समाज के वोटिंग पैटर्न में बदलाव की भविष्यवाणी की गई थी, जो भाजपा की जीत के रूप में सामने आई।
बिहार की राजनीति में जहां जातीय समीकरण अब भी अहम भूमिका निभा रहे हैं, वहीं एंटी इनकंबेंसी का यह नया फैक्टर सत्ता बदलने में निर्णायक साबित हो सकता है। नीतीश कुमार की 20 साल की सत्ता अब कठिन दौर में है, और जनता का मूड स्पष्ट संकेत दे रहा है कि बदलाव की लहर मजबूत हो रही है।
