जातिगत जनगणना पर केंद्र सरकार की चुप्पी पर कांग्रेस का हमला, सचिन पायलट ने उठाए सवाल

केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जनगणना को लेकर जारी किए गए नोटिफिकेशन में जातिगत जनगणना का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है, जिसे लेकर कांग्रेस ने सख्त आपत्ति जताई है। कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जनगणना को लेकर जो अधिसूचना जारी की गई है, उसमें जाति से संबंधित जानकारी को एक बार फिर नजरअंदाज किया गया है।

पायलट का केंद्र सरकार पर सीधा हमला

सचिन पायलट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि केंद्र की अधिसूचना में जातिगत जानकारी इकट्ठा करने का कोई जिक्र नहीं है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जनगणना के लिए पर्याप्त बजट का प्रावधान भी नहीं किया गया है और सरकार ने इसे दो साल बाद कराने की बात कही है, जो कि इस प्रक्रिया को और टालने की रणनीति है।

पायलट ने कहा, “जो सरकार पहले जाति जनगणना की मांग को ‘अर्बन नक्सल’ की सोच बताती थी, आज वही सरकार दबाव में आकर जनगणना की बात कर रही है, लेकिन इसमें भी जाति का कोई उल्लेख नहीं करना उनकी नीयत पर सवाल खड़े करता है।”

कांग्रेस ने सुझाया तेलंगाना मॉडल

कांग्रेस नेता ने केंद्र को सुझाव देते हुए कहा कि अगर सरकार वाकई में सामाजिक न्याय को लेकर गंभीर है, तो उसे तेलंगाना सरकार द्वारा अपनाए गए जाति सर्वे मॉडल को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल जाति की गिनती करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनसंख्या के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक डेटा भी एकत्र किए जाने चाहिए।

तेलंगाना सरकार ने हाल ही में व्यापक स्तर पर जातिगत सर्वेक्षण कराया था, जिसमें केवल जाति ही नहीं, बल्कि संबंधित वर्गों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का भी विश्लेषण किया गया था। पायलट का मानना है कि यही मॉडल पूरे देश में लागू होना चाहिए ताकि नीतियां अधिक न्यायपूर्ण और प्रभावी बन सकें।

बीजेपी हमेशा रही जाति जनगणना के विरोध में

सचिन पायलट ने भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा की सोच हमेशा से जातिगत जनगणना के खिलाफ रही है। उन्होंने कहा, “इसमें किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है कि बीजेपी जाति आधारित जनगणना के खिलाफ रही है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विषय को अर्बन नक्सल सोच से जोड़ दिया था और इसे मजाक उड़ाने योग्य बता दिया गया था।”

पायलट ने कहा कि यह केवल राजनीतिक मजबूरी है कि अब सरकार जनगणना को लेकर दबाव में कुछ कदम उठाने को तैयार हो रही है। लेकिन वह अभी भी स्पष्ट रूप से जाति आधारित गणना के पक्ष में नहीं दिख रही है।

जातिगत जनगणना क्यों है जरूरी?

जाति जनगणना को लेकर वर्षों से यह मांग उठती रही है कि इससे समाज के विभिन्न वर्गों की स्थिति को ठीक से समझा जा सकेगा और सरकार उनके लिए योजनाएं अधिक प्रभावी ढंग से बना सकेगी। वर्तमान में पिछड़ा वर्ग और अन्य कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण और सुविधाएं तय करने का आधार आंकड़ों के अभाव में अनुमान पर आधारित होता है।

कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि सटीक आंकड़े ना होने के कारण असली हकदारों को योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

केंद्र सरकार द्वारा जारी जनगणना नोटिफिकेशन में जातिगत आंकड़ों को नजरअंदाज किए जाने से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में नाराजगी है। सचिन पायलट जैसे वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अगर सरकार समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना चाहती है तो उसे जाति जनगणना को न केवल मान्यता देनी होगी, बल्कि तेलंगाना मॉडल को अपनाकर इसे और अधिक व्यापक बनाना होगा।

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