आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पार्टी के प्रमुख और भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले राघव चड्ढा ने अब अलग रास्ता चुन लिया है। शुक्रवार, 24 अप्रैल को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ मिलकर घोषणा की कि उन्होंने और राज्यसभा के दो-तिहाई सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है और सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि चड्ढा के जाने से आप को कितना नुकसान होगा।
केजरीवाल के करीबी और रणनीतिक चेहरा
अरविंद केजरीवाल के साथ राघव चड्ढा का रिश्ता सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि भरोसे का भी माना जाता था। पार्टी के भीतर उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता था जो मुश्किल हालात को संभालने में माहिर थे। चुनावी रणनीति बनाना, उम्मीदवारों का चयन करना और संगठन के अंदर विवाद सुलझाना—इन सभी मामलों में उनकी सक्रिय भूमिका रहती थी।
साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आप की जीत को ऐतिहासिक माना जाता है। इस जीत के पीछे कई नेताओं का योगदान था, लेकिन रणनीतिक स्तर पर राघव चड्ढा की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत किया और चुनावी अभियान को दिशा दी। भगवंत मान को मुख्यमंत्री चेहरा बनाना भी उसी रणनीति का हिस्सा था। इस जीत के बाद चड्ढा की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी, जो सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी पार्टी को मजबूत कर सकते हैं।
वह आप की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी के सदस्य भी थे, जो पार्टी के बड़े फैसले लेने वाली सबसे अहम टीम मानी जाती है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि केजरीवाल के बाद अगर कोई सबसे भरोसेमंद नेता है, तो वह राघव चड्ढा ही हैं।
रिश्तों में दूरी और पार्टी से अलगाव
हालांकि समय के साथ पार्टी के अंदर समीकरण बदलने लगे। खासकर 2024 के बाद कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिनसे संकेत मिला कि चड्ढा का प्रभाव कम हो रहा है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान उनकी सक्रियता कम दिखाई दी, जिसके बाद उनकी भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती गई।
2025 में मनीष सिसोदिया को पंजाब की जिम्मेदारी मिलने के बाद चड्ढा का प्रभाव और घटा। वहीं सत्येंद्र जैन जैसे नेताओं की भूमिका बढ़ने लगी। इसके अलावा उन्हें राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया गया और सरकारी आवास भी खाली करना पड़ा, जिसे उनके घटते प्रभाव के संकेत के तौर पर देखा गया।
धीरे-धीरे पार्टी के बड़े फैसलों में उनकी भागीदारी कम होती चली गई। खुद राघव चड्ढा ने आरोप लगाया कि उन्हें “चुप कराया गया” और पार्टी अब गलत दिशा में जा रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई अन्य सांसद भी उनके साथ हैं और उन्होंने बीजेपी में शामिल होने का निर्णय लिया है।
आप के लिए चुनौती और आगे की राह
राघव चड्ढा का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पार्टी के रणनीतिक दिमाग के बाहर जाने के रूप में देखा जा रहा है। वह उन नेताओं में थे जो चुनावी योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने में अहम भूमिका निभाते थे। ऐसे में उनके अलग होने से संगठन और रणनीति दोनों स्तर पर आप को नुकसान हो सकता है।
खासतौर पर पंजाब जैसे राज्य में, जहां पार्टी की सरकार है, वहां उनकी कमी महसूस की जा सकती है। इसके अलावा, इस घटनाक्रम से पार्टी के अंदर असंतोष बढ़ने की भी आशंका है। अगर उनके साथ अन्य सांसद भी पार्टी छोड़ते हैं, तो यह संकट और गहरा सकता है।
अब सभी की नजर आने वाले 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव पर है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आप इस चुनौती से कैसे उबरती है और बीजेपी इस स्थिति का कितना लाभ उठाती है। इतना तय है कि राघव चड्ढा का जाना पार्टी की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
