एनसीईआरटी की नई किताब में इतिहास पर बड़ा बदलाव: बाबर, अकबर और औरंगजेब के चित्रण में बदलाव

कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) ने कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। वर्ष 2025 में प्रकाशित नई किताबें अब बाजार में आ चुकी हैं और इनमें दिल्ली सल्तनत तथा मुगल काल के इतिहास को लेकर नया दृष्टिकोण अपनाया गया है। खासतौर पर मुगल शासकों बाबर, अकबर और औरंगजेब के वर्णन में उल्लेखनीय परिवर्तन किए गए हैं।

बाबर को बताया गया क्रूर विजेता
नई किताब में बाबर को पहले की तुलना में एक अलग रूप में प्रस्तुत किया गया है। जहां पहले उनके शासन और सैन्य उपलब्धियों को प्रमुखता दी जाती थी, वहीं अब उन्हें एक क्रूर विजेता के रूप में दिखाया गया है। उनके युद्धों और हमलों में की गई हिंसा पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है।

अकबर का मिश्रित चित्रण
मुगल सम्राट अकबर को अब ‘सहिष्णुता और क्रूरता का मिश्रण’ बताया गया है। यानी किताब में उनके धार्मिक सहिष्णुता के प्रयासों जैसे ‘दीन-ए-इलाही’, विभिन्न धर्मों के विद्वानों के साथ संवाद, तथा जज़िया कर को समाप्त करने जैसी नीतियों के साथ-साथ उनके द्वारा किए गए युद्धों और विरोधियों के दमन का भी उल्लेख किया गया है। पहले अकबर को मुख्य रूप से एक धर्मनिरपेक्ष और उदार शासक के रूप में पढ़ाया जाता था, लेकिन अब नया पाठ उन्हें एक अधिक संतुलित रूप में प्रस्तुत करता है।

औरंगजेब को लेकर बड़ा संशोधन
किताब में औरंगजेब को लेकर भी काफी बदलाव किए गए हैं। अब उन्हें मंदिर और गुरुद्वारे तुड़वाने वाला शासक बताया गया है। उनके शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता के उदाहरणों को शामिल किया गया है। पहले की पुस्तकों में औरंगजेब के शासन को मुख्यतः विस्तारवादी नीति और प्रशासनिक निर्णयों के संदर्भ में समझाया जाता था, लेकिन अब धार्मिक कट्टरता के पहलू को भी प्रमुखता दी गई है।

धार्मिक असहिष्णुता के उदाहरणों का समावेश
नई सामाजिक विज्ञान की किताब में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के दौरान धार्मिक असहिष्णुता के उदाहरणों को भी शामिल किया गया है। इस कदम को इतिहास की अधिक व्यापक और बहुपक्षीय समझ के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही यह बदलाव विवाद का विषय भी बन सकता है।

एनसीईआरटी की चुप्पी और स्पष्टीकरण का इंतजार
हालांकि ये नई किताबें अब स्कूलों तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन एनसीईआरटी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। यह बदलाव क्यों किए गए, इसके पीछे की सोच या शैक्षणिक आधार पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। माना जा रहा है कि एनसीईआरटी जल्द ही इस पर प्रतिक्रिया दे सकता है।

विवाद से बचने के लिए किताब में विशेष नोट
संभावित विवादों से बचने के लिए किताब में एक विशेष टिप्पणी भी जोड़ी गई है। इसमें कहा गया है कि “बीते समय की घटनाओं के लिए आज किसी को दोष नहीं देना चाहिए।” यह नोट संभवतः पाठकों को यह समझाने के लिए जोड़ा गया है कि ऐतिहासिक घटनाओं का विश्लेषण वर्तमान भावनाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

पहले भी हुए थे बदलाव
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब एनसीईआरटी ने अपनी पाठ्यपुस्तकों में बदलाव किया है। पिछले वर्ष भी कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे, जिनमें ‘राष्ट्रीय युद्ध स्मारक’ और परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद पर आधारित पाठ को शामिल किया गया था। अब्दुल हमीद भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर यूनिट के बहादुर सिपाही थे, जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में वीरता दिखाई थी।
एनसीईआरटी की इन नई किताबों ने एक बार फिर से इतिहास की पढ़ाई के तौर-तरीकों पर बहस छेड़ दी है। हालांकि ये बदलाव छात्रों को इतिहास की व्यापक और आलोचनात्मक समझ देने के इरादे से किए गए हो सकते हैं, लेकिन बिना स्पष्ट जवाब के ये परिवर्तन कुछ लोगों के लिए चिंताजनक भी बन सकते हैं। अब नजर इस बात पर है कि एनसीईआरटी अपनी ओर से कब और क्या स्पष्टीकरण देता है।

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